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Bhagavad Gita
The Song of God

Bhagavad Gita: Chapter 9, Verse 22

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते |
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् || 22||

अनन्या:-सदैव; चिन्तयन्तः-सोचते हुए; माम्–मुझको; ये-जो; जनाः-व्यक्ति; पर्युपासते-पूजा करते हैं; तेषाम्-उनके; नित्य-सदा; अभियुक्तानाम्-सदैव भक्ति में तल्लीन मनुष्यों की; योग-आध्यात्मिक सम्पत्ति की आपूर्ति; क्षेम्-आध्यात्मिक संपदा की सुरक्षा; वहामि-वहन करता हूँ; अहम्-मैं।

Translation

BG 9.22: किन्तु जो लोग सदैव मेरे बारे में सोचते हैं और मेरी अनन्य भक्ति में लीन रहते हैं एवं जिनका मन सदैव मुझमें तल्लीन रहता है, उनकी जो आवश्यकताएँ होती हैं, उन्हें मैं पूरा करता हूँ और जो कुछ उनके स्वामित्व में होता है, उसकी रक्षा करता हूँ।

Commentary

एक माँ पूर्ण रूप से उस पर आश्रित नवजात शिशु के प्रति अपने दायित्वों का त्याग करने के बारे में सोच नहीं सकती। शिशु की परम और शाश्वत माँ भगवान ही हैं। भगवान केवल उन पर पूर्ण शरणागत जीवात्माओं को माँ जैसी सुरक्षा प्रदान करते हैं। यहाँ 'वहाम्यहम्' शब्द का प्रयोग किया गया हैं जिसका अर्थ यह है 'मैं अपने भक्तों की रक्षा का दायित्व स्वयं लेता हूँ' यह ठीक उसी प्रकार है जैसे कोई विवाहित व्यक्ति अपनी पत्नी और बच्चों की देखभाल का दायित्व अपने उपर लेता है। भगवान दो वचन देते हैं-पहला 'योग' है जिसके माध्यम से वे अपने भक्तों को आध्यात्मिक समपत्ति प्रदान करते हैं। दूसरा 'क्षेम' है जिसके द्वारा वे भक्तों की उस अध्यात्मिक संपत्ति की रक्षा करते हैं जो उनके पास पहले से है। किन्तु भगवान ने इसके लिए अनन्य शरणागति की शर्त रखी है। इसे पुनः माँ और पुत्र के उदाहरण से समझा जा सकता है। नवजात शिशु अपनी माँ पर पूर्णतया आश्रित होता है जो अपने शिशु की पूरी तरह से देखभाल करती है। बच्चे को जब किसी वस्तु की आवश्यकता होती है तब वह रोने लगता है और फिर माँ उसे दूध पिलाती है, उसे स्वच्छ करती है और स्नान आदि कराती है। लेकिन जब वह शिशु 5 वर्ष का हो जाता है तब वह उपर्युक्त सभी कार्य स्वयं करने लग जाता है और कुछ सीमा तक माँ का दायित्व कम हो जाता है। जब बालक युवा हो जाता है और अपने उत्तरदायित्व को अनुभव करने लगता है, तब माँ अपने कुछ और उत्तरदायित्वों का त्याग कर देती है। अब यदि पिता घर में आकर अपने पुत्र के संबंध में कुछ पूछता है कि 'हमारा पुत्र कहाँ है तब माँ उत्तर देती है, 'वह विद्यालय से घर वापस नहीं आया। संभवतः वह अपने मित्र के साथ मूवी देखने गया होगा।' अब माँ की यह मनोवृति उसके प्रति स्वाभाविक हो जाती है किन्तु जब यही बालक 5 वर्ष का था और यदि उसे विद्यालय से लौटने में 10 मिनट की भी देरी हो जाती थी, तब माता और पिता दोनों ही चिन्तित हो जाते थे-क्या हुआ होगा? वह छोटा बालक है और यह आशंका करने लगते कि उसके साथ कोई दुर्घटना तो नहीं घटी। जरा विद्यालय में फोन कर पता लगाएँ।' इस प्रकार बालक जितना अधिक अपने उत्तरदायित्वों को समझने लगता है माँ उतना ही अपने दायित्वों का निर्वहन करना छोड़ देती है। भगवान का नियम भी कुछ ऐसा है। जब हम स्वयं को कर्त्ता मानकर अपनी स्वेच्छा से कार्य करते हैं और अपनी क्षमता पर भरोसा कर लेते हैं तब भगवान अपनी कृपा नहीं बरसाते। वे केवल हमारे कर्मों का लेखा-जोखा रखकर उसी के अनुरूप हमें फल देते हैं। जब हम भगवान के प्रति आंशिक रूप से शरणागत होते हैं और आंशिक रूप से संसार का आश्रय लेते हैं तब भगवान भी हम पर आंशिक कृपा करते हैं और जब हम स्वयं को पूर्ण शरणागत कर देते हैं। "मामेकं शरणं व्रज" तब भगवान हम पर कृपा करते हैं और जो हमारे पास है उसकी रक्षा करने और जो कमी है उसे पूरा करने का दायित्व अपने ऊपर ले लेते हैं।

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